Thursday, October 16, 2008

आज मैं हिमालय की कन्दराओँ में

आज मैं हिमालय की कन्दराओँ में ,
जाना चाहता हुं,
दुनिया दारी की मोह- जाल
छौड़ जाना चाहता हुं,
यहाँ ना-ना प्रकार की
कृतिम सुख, खोखला दिखावा ,
किसी के दुःख में स्वभाविक दुःख,
किसी के खुशी में हँसने की
झूठी कोशिस

अब बर्दास्त नहीं होता ,
अपने स्वाभाविक कर्तब्यों को
छोड़ जाना चाहता हुं,
कृतिम सुख की और ,
हिमालय की कन्दराओ में ..

ये भी मिथ्या है जहा मैं हुं,
वो भी मिथ्या है
जहा जाना चाहता हुं,
वो कल्पना लोक जिसे देखा नहीं,
यह यथाथ लोक जहा मैं जी रहा ,

चलो इसी में, मैं कुछ करता हुं…नही करना होगा.

हिमालय की कन्दराओ में
मेरा जाना कुछ और नहीं
अपने कर्तब्यों को छोड ,
समाज का मूल्यवान योगदान को
लेकर कायरता पूर्वक भाग जाना होगा

हिमालय की कन्दराओ की जगह
मुझे इस समाज को
हिमालय सा उंचाई दे कर
कुछ पाना है,

मुझे कन्दराए नहीं उसकी
चोटी में स्थान पाना है।

"Azad Sikander"

1 comment:

Nirav V said...

Hi

Aapki kavitaye sahime dil ko chujanevali and asmano me udan bharnevalo ke liye hai. Me apka fan ho chuka ho. Sahi me mujhe BIG BAZAR PPT ki jarurat thi and me apke pas blog tak pahuch gaya. Agar ho sake to PPT forward kijiyega. nirav_vaghela2002@yahoo.co.in.

Aaj se regular apki kaviye study karunga.

Nirav