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Friday, April 30, 2010

Mazdooro ki duniya me,

Mazdooro ki duniya me,
mazdooro ki koi kimat nahi,

mazdooro ki mazduri ka phal,
mujh jaisa tatha-kathit intellectual,
kha rahe, unki aakho ke samne,
thenga dikha ke,

Unki aapsi takrar,
mera bana unke,
sosan karne ka hathiyar,

1rs ka kaam kara ke,
chauani dene ka mujhe ,
mila adhikar,

ekta unse hai kosho dur,
Jis se mil sakta hai,
mazdooro ki duniya me,
mazduroko sahi kimat,

Mazdooro ki duniya me,
mazdooro ki koi kimat nahi,

by: Azad Sikander

Sunday, December 13, 2009

"Words from my Soul": मेरे जेब में पड़े चंद सिक्को की खनखनाहट कुछ कहती हैं!

"Words from my Soul": मेरे जेब में पड़े चंद सिक्को की खनखनाहट कुछ कहती हैं!

मेरे जेब में पड़े चंद सिक्को की खनखनाहट कुछ कहती हैं!

मेरे जेब में पड़े चंद सिक्को की
खनखनाहट कुछ कहती हैं
पैदल चलने के दरमाया
निरंतर गिरते पैसो के मूल्य के दौर में

खुशी की वह गीत
जिसे अर्जित करने में
जलाया दिन-भर शरीर का
खून जिससे मिलेगा
आज शाम और कल सुबह का
नून - भात
“मुझे और सिर्फ मुझे,”

रात के सोने से पहले तक
और भोर जल्दी जगने के बाद ,
पौ फटने तक का
दीया में तेल,
सप्ताह भर काम करने के बाद
निया - निया बचा कर
फटे कपड़ो को धोने का साबुन,
बेमेल चप्पलो को मरमत कराने का साहस


मरे जेब में खनकते सिक्के
कुछ और भी कहती हैं
पूरे परिवार की नून-भात
न खरीदने की अछमता,
चंद मिले के लिये
ऑटो भाडा न देने की छमता,
शुद्ध पानी की
पहूच की कमी का एहसास,
जिससे होती अधिकतम बीमारियाँ,

फिर भी मरे जेब में
खनकते सिक्के कुछ कहती है
चाहें सिक्क्को की
क्रय शक्क्ती मेरी
आधारभूत वस्तुओ को
खरीदने में अक्क्षम हो
पर मेरे जब में हैं,
मेरी हैं,

मेरे जेब में खनकते
सिक्के कुछ कहती हैं


“Azad Sikander”

Tuesday, December 1, 2009

शाम को सोने के, पहले पिता हुँ कि,

 शाम को सोने के,

पहले पिता हुँ कि,
भूल सकू दिन कि
उठाई गई तकलीफो को
जिससे मिला शाम का भोजन

भूल सकू बेवजह कि गलियों को,
जिसका हक़दार मैं नहीं
भूल सकू मेह्न्ताना कि कमी को
जिसका हक़दार मैं हुँ

भूल सकू सर पर छत नहीं
भूल सकू बचा स्कुल जाना चाहता है
भुल सकू बुढे माँ-बाप के इलाज को,

भूल सकू बीबी का तन दिखता है
फटे कपड़ो से,
भूल सकू कल का भोजन
कहाँ से आएगा

और….

सो सकू sukun  se आज कि रात
आज कि रात…।

"Azad Sikander"

Monday, November 30, 2009

काश कभी ये हो जाये

काश कभी ये हो जाये

काश कभी ये हो जाये,
मेरी धड़कने दूर बैठे,
परदेश मे भी वैसे सुनाई दे,
जैसे मेरे बगल में बैठा हो,

काश कभी ये हो जाये कि,
तेरी खुशी मेरे अरमानों के साथ जुड़ जाये,
जैसे शरीर से आत्मा जुड़ां है.

काश कभी ये हो जाये ,
तेरी याद आये, और तू,
नजर आ जाये,
जैसे सामने खड़ा हो,

काश कभी ये हो जाये,
मेरे आँखो से आँसू निकले,
और तू हाथ रखा हो,
कि जमी पर ना गिर जाये,


लेकिन ये ना होना है,
दिल तो मेरा है उसे,
हर हाल मे तुझको खोना है,

आखीर तू जो ठहरा
रमता जोगी बहता पानी ,
आज याहाँ कल वहाँ ,
परसों जाने कहाँ?
फिर भी काश ये हो जाये. 

By: Swanjali

Friday, September 18, 2009

Main paristitiyua ka gulam nahi

विपरीत परिस्तितिया,
हर किसी के जिंदगी में आती हैं,
किसी के मुकदर में कम,
किसी के मुकदर में जादा,

हर परिस्तिति का अपना ही मजा हैं,
कोई हँस के उड़ा देता हैं,
कोई रो के परेशान होता हैं,

हम तो मजा lete hai,
uske sath do- do haath kar ke,
use harne ki kosis kar ke,
koi bhi hamara mukadar,
nahi likh sakta,
sab hamare haath me hai.

paristitiya meri mahnet ki gulam hai,
main paristitiyua ka gulam nahi.

                "Azad Sikander"

Monday, April 6, 2009

तो ओरिजनल Kaya hai

बीती रात मेरे पड़ोस के,
घर का कीमती सामान चोरी हो गया।
जिस बस स्टाप से बस पकड़ता था,
उसका ढाचा चोरी हो गया।

बिजली का तार चोरी हो गया,
जिससे रोसन होता था मेरा,
मोहल्ला ,
सडको पर लगा अलकतरा भी ,
चोरी हो गया।

यारो चोरी होने की लिस्ट,
यहाँ से सुरु होती है।

धन - दौलत के बाद ,
कला - संस्कृति, रहन -सहन ,
खान - पान , साहित्य ..........
सब कुछ चोरी हो रहा।

यहाँ तक भी थी ठीक था
,हद तो तब हो गई जब मेरी,
महबूबा ने भी कह दिया,
"maine uska dil chura लिया"

अब मैं परेसान हो गया,
इश लिस्ट की लम्बाई देख के,
और सोच में पड़ गया,
आख़िर सब तो चोरी का ही है तो,
ओरिजनल कया है?

तो ओरिजनल kaya hai
.........................!

"Azad Sikander"

Tuesday, March 10, 2009

"जिंदगी है अनमोल"

मेरी - तुम्हारी, उसकी- उसका ,
हम सभी की जिंदगी,
मेरी "जान" की लटो की तरह है।

जैसे कंघी उलझे लटो को सुलझाती है,
और हवा का झोका,
उसे पुनः उलझती है।

ठीक ऐसे ही हम पल- पल ,
जिंदगी के उलझे सवालो को,
तरह- तरह से सुलझाते है ,
एक पल सुलझती है तो दुसरे पल
पुनः उलझ जाती है
नए सवालो से।

जिंदगी के ये उलझे सवाल,
और उसके सुलझाने की कोसिस
उलझन- सुलझन का रोचक खेल
बनती है हमारी जिंदगी को।

यह उलझन- सुलझन खेल,
हमें एहसास दिलाती है,
हम जिन्दा है , जिंदगी जीने के लिए है
मुह मोड़ने के लिए नही।

जियो दिलखोल के जियो,
"जिंदगी है अनमोल"।

"Azad Sikander"

Wednesday, January 14, 2009

अभी तो फाका है,

अभी तो फाका है,
चलो,
घसको, घूसो, चढ़ो, आगे बढ़ो.

अभी तो हवा आने जाने की,
जगह है मतलब फाका है,

लोकल परिवहन में,
दिल्ली की कड़कडाती जाड़ में,
पसीना आने लगे,
गर्मियों में बरसात सा भीगने का,
अहसाह होने लगे,

फिर भी ,
अभी तो हवा आने जाने की,
जगह है मतलब फाका है

जेब से बटुआ खाली हो जाय,
और हम बेवश देखते रहे,
कुछ न कर पाने की बेवसी में,

फिर भी ,
अभी तो हवा आने जाने की,
जगह है मतलब फाका है

दो जिस्म , सामान या बिपरीत लिंगी,
एक सा न दिखने लगे और,
मालिश हो कर थकन न मिट जाए जिस्म की,
तब तक फाका है ,
हमारे लोकल सार्वजनिक परिवहन में.

अभी तो फाका है,
चलो,
घसको, घूसो, चढ़ो, आगे बढ़ो.


"Azad Sikander"

Monday, January 12, 2009

हम सभी नशे में चूर हैं

हम सभी नशे में चूर हैं ,
शायद
तुम अपने बटुआ में पड़े पैसे के नशे में,
चमचमाती कार में बैठे खुबसूरत ,
बीबी की खूबसूरती के नशे में,
आली सान बंगला होन के नशे में,
बाप के जायज या नाजायज पॉवर के नशे में,
या झूटी सानो साकोत के नशे में ,
आदि- आदि,

मैं तो चूर हुँ,
अपनी खाली बटुआ को छिपा कर,
फटे कपड़ो को छिपा कर,

इलाज के इलाज को छिपा कर,
अपने ना - ना प्रकार के मजबूरियों को छिपा कर ,
आदि- आदि ....को छिपा कर,
दारू के दो पैक पि कर, उसके नशे में ,

"Azad Sikander"


Saturday, October 18, 2008

In the Night

In the night,
The light of full moon,
falls in the river,
Whose reflection,
Falls on the surrounding,
Beauty the reflection,
Seen that night,
In "chotta nagpur pathar"
As mind blowing,
Whose beauty is joy forever to me,
Whenever i remember that moment.

"Azad Sikander"

Thursday, October 16, 2008

आज मैं हिमालय की कन्दराओँ में

आज मैं हिमालय की कन्दराओँ में ,
जाना चाहता हुं,
दुनिया दारी की मोह- जाल
छौड़ जाना चाहता हुं,
यहाँ ना-ना प्रकार की
कृतिम सुख, खोखला दिखावा ,
किसी के दुःख में स्वभाविक दुःख,
किसी के खुशी में हँसने की
झूठी कोशिस

अब बर्दास्त नहीं होता ,
अपने स्वाभाविक कर्तब्यों को
छोड़ जाना चाहता हुं,
कृतिम सुख की और ,
हिमालय की कन्दराओ में ..

ये भी मिथ्या है जहा मैं हुं,
वो भी मिथ्या है
जहा जाना चाहता हुं,
वो कल्पना लोक जिसे देखा नहीं,
यह यथाथ लोक जहा मैं जी रहा ,

चलो इसी में, मैं कुछ करता हुं…नही करना होगा.

हिमालय की कन्दराओ में
मेरा जाना कुछ और नहीं
अपने कर्तब्यों को छोड ,
समाज का मूल्यवान योगदान को
लेकर कायरता पूर्वक भाग जाना होगा

हिमालय की कन्दराओ की जगह
मुझे इस समाज को
हिमालय सा उंचाई दे कर
कुछ पाना है,

मुझे कन्दराए नहीं उसकी
चोटी में स्थान पाना है।

"Azad Sikander"

Wednesday, December 12, 2007

नैनौ में समुद्र भरे हुए.........

नैनौ में समुद्र भरे हुए,
दिल में तूफान लिए
मन में द्दुंद लिए
अपने सपनो को
अमावस कि काली रात में
गला घोट के

लबो पर मुस्कराहट बिखरते हुए
चहरे पर ताज़गी लाते हुए
देह में चंचलता लिए

चमकीली लाल साडी से
तन को ढके हुए
अनिश्चित भाविये कि और
मंगल गीत के साथ

औरत चली

किसी के सुख को,
किसी के दुःख को
अपना समझते हुए
शायद अपने को खोकर
किसी ओर का घर बसाने.........

"Azad Sikander"

Wednesday, December 5, 2007

प्रेमी प्रेमीका का प्रेम भी..........

प्रेमी प्रेमीका का प्रेम भी,
अजीब प्रेम प्रसंग हैं
हर प्रेमी जानने को रहता है ,
बेकरार की मेरी प्रमिका के

दिल में कितनी चाहत है मेरे लिए
क्यो करती है मुझ से प्रेम
सारी दुनिया में से मैं ही
क्यो बसता हुँ उसके दिल में?

ठीक यही ,
हर प्रेमीका अपने प्रेमी
से जानने को रहती हैं बेकरार

अगर प्रेमी – प्रमिका में से
एक भी हुआ कवी .......
जो दुनिया भर की बाते
कहता हो अपने कविता में
हर भावनाओं को ढालता हो शब्दो में

सिवाए इसके जो प्रेमिका
सुनना या जानना चाहाती हैं ...
तो हुआ गजब

कैसे कोई प्रमी सटीक कहे
चाहे वो कवी ही क्यो न हो
इन –in कारण से जान छिड़कता हुं तुम पर

प्यार दिल से होता है
जो भावनाओ से भरा हैं,
ये किसी पर भी मोहित हो जाये
जैसे मजनू का दिल लैला पर

दिमाग से नही होता प्यार
सोच-विचार कर
वरना प्यार –payar न होकर
सम्झोता हो जाये

प्रेम कोई वस्तु होती तो तोल कर
कोई भी बता दे की
मैं इतना करता हुं प्यार

मत पूछो क्यो ,
कितना और कब से करता हुं प्रेम
बस मैं यहीं कह सकता हुं
तुम से करता हुं प्रेम,
और सिर्फ तुम से.........

“Azad Sikander”

Wednesday, November 28, 2007

तुझको आना होगा

तुझको आना होगा
किया वादा निभाना होगा
तुम बिन ये फगुआ फीका रे

इह फगुआ में
रंग हिन् दिल में
प्यार के रंग भरना होगा
तुझको आना होगा रे

तुम बिन लागे ये मन,
बिन मछली के ताल
आजा रे इह फगुआ में
तुम बिन होली के रंग फीका रे

आजा-आजा रे
भर दे इस फगुआ में
प्यार के रंग
आजा- आजा रे…………





"Azad Sikander"

उत्पाद .........

इल्जाम न लगाओ
बेवफ़ा हैं हम
दिल तुम्हारा चुरा कर
तोड़ दिया हमने

कभी पूछा
मुहबत थी आप से हमें
पूछोगे भी कैसे?
और क्यों?

उत्पाद जो समझ रखा हैं,
आप और आपके समाज ने
कास समझ पाते हमें आप
हम स्त्री भी हैं प्राणी…

"Aazd Sikander"

Wednesday, November 21, 2007

बाबा ने किया प्रावधान

बाबा ने किया प्रावधान ,
अनुसूचित जाती व जनजाति को,
मिलगा आजादी के कुछ वर्षो तक,
आरछ्न का लाभ

नुमाइन्दे हमारे आजादी के इतने
वषो के बाद भी सकते रहे वोट कि
आग में कुर्सी कि भूख बढ़ा-बड़ा
आरछन कि तारीख

phir

हम पिछडे वर्ग क्यों न करे मांग
हमे भी दो हमारे आबादी
के बराबर आरछन ,
हमारी हैं बहुमत
अंगाडे पैसे से बलवान तो हम संख्या में
लोकक्तंत्र का हैं सूत्र संख्या
बहुत दबे हम ,
बस अब दो हमे आरछन का लाभ

वाँहः भाई खूब कहे
क्या निकला हैं उपाय
मेहनत से बचने का
भाई से भाई को बाटने का
गुलामी कि दस्ता को बुलावो देने का

मुद्दतो बाद मिली हैं स्वछः हवा में
साँस लाने का अवसर
वह भी खोना चाहते हैं आप
आरछन जैसे वाइरस को बुला कर
अब तक SC, ST और आज OBC
कल आर्थिक पिछडे ............

रोको रोको इसे रोको
ठुंठों अन्य मार्ग
बनाओ ससक्त अपने को

आरछन नहीं संसाधन चाहिऐ हमें


"Azad Sikander"

Sunday, November 4, 2007

मेरी कलम चलते-चलते ...........

मेरी कलम चलते-चलते
रुक सी जाती हैं
लेखनी के भाव- लय
बिच में ही भंग हो जाती हैं

मुझमे हिमालय सा
द्रिद्ता तो हैं पर
सागर सा गहराई नहीं

उत्साह तो हैं मगर
वह भी अधूरा
शायद इसलिय की
मैं खुद हुं अधुरा तुम बिन…………


"Azad Sikander"

किताब के हर .........

किताब के हर ,
पन्ने पर हर अछर,
नैनो को तेरे
नाम सी लग रही,
मन को हर चीज
तेरी तस्वीर सी लग रही

जाने अनजाने यह क्रम
बार- बार दोहरा रहा,
लगता हैं जैसे
अपने आप को खो कर
तुम्हे पाने कि राह हैं !!!!!!

"Azad Sikander"

Wednesday, October 31, 2007

सारी प्रिथ्वी को कागज.....

सारी प्रिथ्वी को कागज,
सारी जंगल को कलम,
सातों समुद्रो को स्याही,
बना कर लिखने पर भी,

मैं बयान नहीं कर पाऊन्गा,
"आप" से " तुम " में ,
जितना खुशी हुई थी,
उससे कई गुना ज्यादा,
"तुम" से "आप" में दुख होती हैं,

पर........

मैं तब भी वही था ,
अब भी वही हुँ बस,
कुछ सलीके बदल गए
सम्बंधो के

तथाकथित समाज द्रारा,
लादे गए संबंधो ,
और जिम्मेदारियों से,

जिसको तोड़ने कि जिम्मेदारी,
मुझ जैसो पर हैं,
पर हिम्मत कहाँ ?
तूफान से लोहा लेने कि..........

"Azad Sikander "