Wednesday, October 17, 2007

मगज की द्दन्द ....

जब भी मैं घर से,
विद्यालय जाता हुं,
बिच रास्ते में,
चौमुहाना आता है,
यहीं वह जगह है,
जहाँ से लोग अपने-अपने,
जरुरत के हिसाब से,
रास्ता बदल लेते है,

मैं उत्तर दिशा वाले रास्ते,
पर चला जता हु,
इसी दिशा में है विद्यालय,
पश्चिम में अस्पताल
पुरबा में बाज़ार और,
दकिन में मुझ निम्न-वर्गिये का झोपडा़,

कई वर्षो से इसी रास्ते से ,
आता-जाता रहा ,
बिना किसी अवरोध के ,
पर ये क्या?
आज मरे कदम इस
चौमुहाने पर क्यो रूक गए?

अभी-अभी तो पढ़ाई ख़त्म किया हुं,
पुरी दुनिया है जितने को,
हाथो में हुनर है,
सब कुछ तो है,

फिर मगज में ये कैसा द्दंद!

किधर जाऊँ,
पूरब मॆं, बाज़ार पार कर,
उस शहर में,
जहाँ सिर्फ "मैं" हैं,
हर चीज लुभावनी दूर से,
नजदीक से दिखावटी,

या दक्षिण दिशा कि ओर,
जिधर मुझ निम्न मध्य वर्गीय,
के झोपडा़ के आगे जहाँ "हम" हैं,
अपनापन है, पर दरिद्रता भी है,
आँशु है जिसे पोछने की ,
जिम्मेदारी मुझ जैसों पर है,

जाँऊ तो जाँऊ कहाँ?
एक तरफ खोखली ख़ुशी,
दुसरी तरफ खुशी के आँशु,

मेरी तरह आप भी ,
इस चौराहे पर आये होंगे,
या ये आपका इन्तजार कर रह होगा,

मैंने तो तय कर लिया,
उमीद है आप भी अपने विवेक,
से कर लेंगे ,
जिससे ज्यादा मानव हित हो सके।


"Azad Sikander"

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