कब से बाहें फैलाये,
निन्द्रा देवी तुम अपने ,
आगोश में मुझे लेने को,
बेक़रार हो,
पर डरता हु तेरी बाहों,
में जाकर वो सपना ,
ना देखने लगू,
जिसमे मुझे मेरी प्रियसी का,
चेहरा दिख जाये,
"जिसे" प्रियसी कहने,
से भी डरता हुँ
डरता हुँ सपने के,
टूटने से, तुम्हारे बाँहौ,
से वापस आते ही,
जिसमे "उसका"खिलता,
चेहरा देख रहा होऊंगां,
अतःएव हे निन्द्रा देवी,
तुम से विनम्र निवेदन है,
अपनी बाहें समेट लो,
और छोड़ दो ,
सपना देखना,
मुझे सोभाग्य मिलेगा,
कभी तुम्हारी आगोस में,
सकुन से सोने का ,
सायद कभी वो दिन आये ,
भी तो कहीं मेरी आखरी ,
दिन ना हो,
जब मुझे ये डर ना,
"उनका" कि तुम्हारे,
आगोस में,
मेरा सपना ना टूटेगा....
"Azad Sikander"
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