Sikander Kushwaha
Thursday, October 25, 2007
वाँहः रे इन्सान
वाँहः रे इन्सान ,
छोड़ मन के मूरत,
पूजत है ,
पत्थर के मूरत,
पूजत- पूजत मर गए ,
पर न तोरा पईलाँ ,
न मन के ही संतोख मिलल .
फिर भी न छोड़्त है पत्थर,
पूजन...........
"Azad Sikander"
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