Thursday, October 25, 2007

मेरी अंग्रेजी की ज्ञान

मैं रोज़ कि तरह चला विधाल्य,
पंहुचाँ मगर हो गया थोड़ा देर,
डर रहा था कहीं भगा न दे सर,
लेकिन सोचना था गलत,
भागने वाले शिक्षक थे मरे पीछे,

पंहुचाँ कच्छा दोस्तो से मिला ,
मगर एक दोस्त नहीं आया था,
जो था सबसे करीब,
गए प्राथना सभा,
वहा प्रचार्य ने सूचना दिया,
संगठन में कविता लिखो प्रतियोगिता है.

सुन कर ख़ुशी हुई लेकिन,
जैसे ही कहा यह केवल अंग्रेजी में लिखना है,
मेरी उम्मिदो पर पानी फिर गया,
अंग्रजी थी समझ के बाहर.

पर हार न मानी ,
लगा लिखने कविता
हर बार शिर्षक बदलता,
फस जाता हर बार,
एक या दो पंक्ति में ही,

न जाने कितने पते पन्ने,
लगी सफलता हाथ न ,
अंत में दिल से आई आवाज़
मत कर असफल प्रयास,
पहले सिख अंग्रजी ,
फिर लिखना कविता अंग्रेजी भाषा में…॥


"Azad Sikander"

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