शाम को सोने के,
पहले पिता हुँ कि,भूल सकू दिन कि
उठाई गई तकलीफो को
जिससे मिला शाम का भोजन
भूल सकू बेवजह कि गलियों को,
जिसका हक़दार मैं नहीं
भूल सकू मेह्न्ताना कि कमी को
जिसका हक़दार मैं हुँ
भूल सकू सर पर छत नहीं
भूल सकू बचा स्कुल जाना चाहता है
भुल सकू बुढे माँ-बाप के इलाज को,
भूल सकू बीबी का तन दिखता है
फटे कपड़ो से,
भूल सकू कल का भोजन
कहाँ से आएगा
और….
सो सकू sukun se आज कि रात
आज कि रात…।
"Azad Sikander"
4 comments:
खुसवाहा साहब, एक गरीब का मर्म आपने बेहद ख़ूबसूरत ढंग से कविता में उतारा है , मगर आपने टंकण त्रुटियों पर ध्यान नहीं दिया ! पीता को पिता पढ़ना ही अपने आप में अटपटा सा लगता है ! भविष्य में इन्हें सुधारे और में दावे के साथ कह सकता हूँ कि आपके अन्दर एक लाजबाब कवि बैठा है, बस जरुरत है उसे बाहर मंच पर लाने की, शुभकामनाओं सहित !
bhai , bahut sahi , meri bhi shubkamnaon ke sath tum khub badho... or khub likho.....
may shabdon ka tana bana or banawat ko utna bareek nahi leta per aapki soch se prabhavit hun...
may aapki kala or mentality ka fan ban gaya hun... wah ....
Sensibilities' woven words..
Really a great poet within you!👍
Sensibilities' woven words..
Really a great poet within you!👍
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