आप वहाँ हम यहाँ,
फिर भी कभी-कभी,
लगता है जैसे आप,
हमरे सामने पड़े ,
मेज़ पर बैठे हो,
लगता है आपके होंठ ,
खुले है हमे पुरानी,
बाते याद दिलाने के लिए,
जैसे हम भूल चुके हो,
लगता है आपके सवालो,
का मैंने कुछ उटपटॉग,
जबाब दिया और,
आपका रोम-रोम खुल,
कर हँस रह हैं,
लगता है आप हमे,
कहीं घूमाने को कह,
रही हो और मेरे इंकार,
से आपना कोमल हाथ,
उठाया हो रसीद करने को,
लगता है आप मेज,
से उठ कर खड़ी हो,
गई हो जाने के लिए,
कल मिलने का वादा कर
आप वहाँ हम यहाँ,
फिर भी कभी-कभी,
लगता है हम
यहाँ आप यहाँ।
"Azad Sikander"
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