समुद्र के किनारे बैठा़,
इन पंक्तियों के लेखक को,
देख रहा हैं,
दूर कहीं क्षितिज में जहाँ,
सागर और आकाश मिलते से प्रतीत होता हैं,
सागर नीले रंग लिए शांत सा दिखता है,
जिसके गर्व में भांती-भांती कि खिचड़ी पकती है,
उसी क्षितिज में निम्न दाब,
बनकर हवाऊ का रुख के संग,
तट तक आते- आते,
तुफान का रूप ले लेटी है,
अपने पराक्रम से सबका,
रूप बदलने का दम रखता है,
यह भी देख रहा ..
हमारे समाज के असमानता को,
गरीबी कि मक्कड़-जाल को,
जात-पात के भेद-भाव को,
ना-ना प्रकार के समस्याओं को,
जिसके रखवाले समाज के
चंद तथाकथित ठेकेदार,
बढ़ा रहा बहुजन के आक्रोस को,
इस आक्रोस के गर्व में क्रान्ति का,
बिज बु चूका,
कुरीतियों को मिटाने के लिए,
धीरे -धीरे बन कर निम्न दाब,
इसके कदम तट कि और ,
तेजी से बढ़ रहा ,
यह अपने सन्ग हमारे बेहतर,
समाज के कल्पना को यथार्ता,
करने आ रहा ,
कभी भी , शायद आज ही ,
क्रान्ति कि तुफान आने वाला है,
साथियों अपने बाँहें फैला कर,
त्तैयार हो जाओ उसके स्वागत के लिए,
चलो साथियों उसके कंधे से कन्धा
मिला क्रान्ति करने...........,
"Azad Sikander"
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