Saturday, September 29, 2007

हम जिए जाते है कि!

हम इन्सान योनि में जन्म लिये,
इसपर हमारा वश नहीं था,
पर हम जिए जा रह है,
इस पर हमारा वश हैं,

क्या मतलब है जिंदगी का,
क्यों हम जिए जा रहें है,
क्या मजा है इस जीने में ,
दावे से तो नहीं कह सकता,
पर कुछ तो बात है.

यह बात क्या हैं?
पता लगाते-लगाते कई
ऋषि-महात्मा परलोक सिधार गए,

इसमे से कुछ ने सुझाया,
दूसरो के लिए जिए जाते है,
कुछ ने कहा अपने लिए,

आखिर जिए तो जिए किसके लिए?

खली हाथ लोग आते है,
और खली हाथ जाते है,
जाने के पहले कुछ पाना ,
और देना चाहते है

अखिर जाने के बाद ,
दो गज जमीं या चन्द,
लकडियॉ ही तो चाहिऐ ,
इस नस्वर शरिर को भस्म होने के लिये

तो क्या है वह जो लेना ,
और देना चाहते है हम?

हम सभी है भूखे ,
दो रोटियां बुझाती है,
पेट कि आग को,
पर क्या होगा मन और
आत्मा कि भूख का,

इसे तो चाहिऐ प्यार कि मरहम,
प्यार ही इस आग को बुझा सकता है,
प्यार ही हम लेना और देना चाते है,
चाहे वो किसी भी रिश्ते का हो,
प्रेमी-प्रेमिका, माँ- बेटा,
पिता –putri,.....................

इसी प्यार को बढ़ाने के,
लिए हम जिए जाते हैं,
यही है जिंदगी का सारंस,
यही है आखरी मंजिल इस जीवन का.......

"Azad Sikander"

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