Saturday, September 22, 2007

मेरी अरमानों को कविता मे


मेरी अरमानों को कविता मे,
जो अगर उ ही ढालते रहोगे,
तो एक दिन आरमान मेरे ,
तेरे कविता बन जायेंगे.

कागजो पर,
लिखे तेरे हर शबद्ध,
कि बोल मेरी ही होंगे,

तेरी हर सोच पर ,
मेरी ही झलक होगी,
तेरे लेखनी कि स्याह ,
मैं ही होंगी.

तेरे हर गीत कि,
स्वर मेरे ही होगी,
तू –तू मे ना रहकर,
‘मैं’ मे ढल जायेगा,

और कही ऐसा ना होजाये कि,
तुझे भूलने के बदले मेरी,
जान तुझमे ही आटक जाये .......


"Azad Sikander"

No comments: