Tuesday, September 25, 2007

मैं और औस

चिडियाँ चहः-चहा रहे है ,
बैसाख कि प्रातः बेला मे ,
सुर्य लालिमा लिए पूरब,
से निकलने को तैयार हो रहा,

हवा मे भीनी-भीनी ,
फुलो कि खूंशबू,मद्होस
करने वाली तैर रही है,

मैं भी मनमोहक,
वातावरन का आनंद लेने,
के लिए लोने के मुलायम ,
घास के ऊपर बिछे औस
के चादर पर कुरशी रख,
लगा लेने चाय के संग,
अख़बार का मजा,

मेरी नज़र एक ओस पर पड़ी,
लगा जैसे हँस रहा है,
भरम समझ फिर से,
होगया अखबार मे लीन,
तोड़े देर मे फिर देखा,
तो वो ओस का कन हँस
रह था ज़ोर-ज़ोर से,
मैंने पुछा तू तुछ कन
मुझ पर काहे हँस रहा है,

तुझे पता नहीं है क्या,
अभी थोड़े देर मे ,
सुर्य कि किरने तुझे ,
सोख कर नष्ट कर देगी,
पल भर कि जिंदगी,
और मुझ पर हँस रहा है,

जानता हुँ पल भर कि,
जिंदगी है मेरी पर,
मैंने तो अपना कम कर दिया,
इस घास को जिवन देना था दे दिया,
मैं मर के भी इस घास मे जीवित रहूंगा

पर तू अहंकारो से भरा ,
क्रूर अपने अन्त को
नही देख पा रहा,

देख ,देख सकता है तो,
तुझ से अभी दूर विपलव ,
कि आग जल गई है,
सुन, सुन सकता है तो
क्रान्ति कि आवाज़ को ,
बहुत तेज़ी से बढ ,
रही है तेरी और ,
तुझे नष्ट करने को ,

उसकी आंधी मै ,
ढह जाये गा तेरी अटालिका ,
ये सानो आराम.
दूर बैठा हाथ पर हाथ,
धरे देखता रहेगा असहाये

मैं उन्ही तुछ प्राणियो,
के क्रान्ति का दूत हुँ ,
जो शत्रु को खतम करने के ,
पहले चताव्नी देने आया हुँ,
बच सकता है तो बचने ,
कि कोशिस कर ले .

अंत तेरा नजदीक है
मेरी दुरद्रिषटी उसे,
देख रही हँ ,
कोई नही बचा सकती ,
तुझे क्रान्ति कि आग से,
इस लिए हँस रहा तुझ पर............

"Azad Sikander"

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