Saturday, September 22, 2007

मैं एक दुकानदार

मैं एक दुकानदार

मैं हुँ दुकानदार,
कहते है लोग,
जबकि करता हुँ ,
लोगो कि सेवा करे का काम,

शायद आदिम काल मे,
लोग स्वालम्भी होंगे,
आज सभी लेन - देन का,
करते है कारोबार,
हर कोई किसी को,
कुछ देता है,
और बदले मे कुछ लेता है,

ऐसे मे तो मैं भी,
भूखे-नन्गो के नाम ,
पर लेता हु पैसा,
उनके तस्वीरे- फिल्में,
अमीरों को बेचता हुं,
बदले मे दया खरीदता हुं,

उनके पास जाकर,
गोल- गोल बात करना,
सपने बेचना,
कल का बेहतर भविष्य दिखाना,
उतेज़ित करना,

कुछ करने का समय आये तो,
वापस आ जाना,
छोड़ कर असहाये उन्हें,

क्या है यह?
दुकानदारी नहीं तो,

बिना लाभ-हानी के ,
कार्य करना, कहना,
और शुभ -लाभ कि,
कामना करना,

गरीबो के गरीबी कि,
आग मे अपनी जिविका कि,
रोटी सेकना,


यह कुछ और नहीं,
शुद्ध दुकानदारी है,
और मैं एक दुकानदार..........


"Azad Sikander"

1 comment:

satyendra said...

Kudos, to the effortfull feeling depicted by you.

A real good work ...

keep it up sir