मैं एक दुकानदार
मैं हुँ दुकानदार,
कहते है लोग,
जबकि करता हुँ ,
लोगो कि सेवा करे का काम,
शायद आदिम काल मे,
लोग स्वालम्भी होंगे,
आज सभी लेन - देन का,
करते है कारोबार,
हर कोई किसी को,
कुछ देता है,
और बदले मे कुछ लेता है,
ऐसे मे तो मैं भी,
भूखे-नन्गो के नाम ,
पर लेता हु पैसा,
उनके तस्वीरे- फिल्में,
अमीरों को बेचता हुं,
बदले मे दया खरीदता हुं,
उनके पास जाकर,
गोल- गोल बात करना,
सपने बेचना,
कल का बेहतर भविष्य दिखाना,
उतेज़ित करना,
कुछ करने का समय आये तो,
वापस आ जाना,
छोड़ कर असहाये उन्हें,
क्या है यह?
दुकानदारी नहीं तो,
बिना लाभ-हानी के ,
कार्य करना, कहना,
और शुभ -लाभ कि,
कामना करना,
गरीबो के गरीबी कि,
आग मे अपनी जिविका कि,
रोटी सेकना,
यह कुछ और नहीं,
शुद्ध दुकानदारी है,
और मैं एक दुकानदार..........
"Azad Sikander"
1 comment:
Kudos, to the effortfull feeling depicted by you.
A real good work ...
keep it up sir
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