आज मुझे याद आता है.....
वो मानसून की पहली
ज़ोरदार बारिस में,
दौड़ कर भींगते-भींगते ,
पेड़ के निचे छुपने के लिए आना ,
और तेज़ वारिस होने से ,
ठंडे -ठंडे पानी के बूंदो को,
पत्तो से होते हुंये ,
हम पर गिरना ,
ऐसे में तुम्हारा मुझ से ,
आलिंगन करना, ओर
मेरा झिझकना,
इस रमनिये वातावरण में ,
तुम्हारी गरम गरम सासों ,
का कहना ,
समेट लो मुझे अपने बाहों में ,
तुम्हारी शारिरिक भाव भंगिमा का,
कहना,
छुपा लो मुझे अपने में,
खो जाने दो मूझ में,
तुम्हारी सरमाती आखों का कहना ,
छोड के ना जाना मुझे कभी,
ऐसे में बारिस का मध्यम होना,
तुम्हारे अरमा का गला घोटना,
और ज़ोर से मेरा कहना,
चलो वारिस रूक गया,
तुम्हे घर तक छोड़ना,
बिना दुबारा मिलने का वादा किये,
चले जाना .....
आज मुझे याद आता है...........
"Azad Sikander"
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