Thursday, September 27, 2007

ऊ तड़पाने से अच्छा था की


तड़पाने से अच्छा था की......

जान ही ले लेते हमारी
हम तो वो हैं,
जो चाहकर भी ना भूल पाते हैं तुझे
ओर तुम.............


हम ने किये हजारो बार गिले
ओर तुम...........


पथर कि मूर्त में जान
डालने कि हमरी जिद हैं
और वो जो हैं पथर बड़ा ही सख्त
होता नही जिस्पे किसी भी बात
किसी भी प्यार का असर....


इतना भी ना भूलाने कि
कोशिश करना क याद भी ना आ सके
इतना भी ना दुनिया दारी करना
की पहचाना भी ना जा सके............

"गुमनाम सक्श"

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