शराबी तो नहीं पर,
शराबी से कम भी नहीं,
उन प्यालो को होठो से,
लगता भी नहीं था ,
जिनमे मदिरा हुआ करती थी,
आज मदिरा से भरे,
प्यालो को होठों से,
हटाने का जी भी नही करता,
यह मदिरा नही
मेरे जीने का आसरा
हो गई है तुम बिन,
नित्य मदिया पीना और,
सोमरस कहना उपर से,
बहाने देना भाती-भाती,
मदिरा को सोमरस का नाम,
देकर, शिवजी का प्रसाद कहना,
ये कुछ और नहीं,
अपने को भुलावे में रखने,
कि झूठी कोशिस है,
जनता हु झूठी ही सही,
पर है हंसीन कोशिस ,
तभी तो कह सकता हु
शराबी तो नहीं पर,
शराबी से कम भी नहीं.......
"Azad Sikander"
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