सारी प्रिथ्वी को कागज,
सारी जंगल को कलम,
सातों समुद्रो को स्याही,
बना कर लिखने पर भी,
मैं बयान नहीं कर पाऊन्गा,
"आप" से " तुम " में ,
जितना खुशी हुई थी,
उससे कई गुना ज्यादा,
"तुम" से "आप" में दुख होती हैं,
पर........
मैं तब भी वही था ,
अब भी वही हुँ बस,
कुछ सलीके बदल गए
सम्बंधो के
तथाकथित समाज द्रारा,
लादे गए संबंधो ,
और जिम्मेदारियों से,
जिसको तोड़ने कि जिम्मेदारी,
मुझ जैसो पर हैं,
पर हिम्मत कहाँ ?
तूफान से लोहा लेने कि..........
"Azad Sikander "
No comments:
Post a Comment