यु ही टकरा गए थे,
हम किसी मोड़ पर,
नजरो से नजर मिली,
दिल को दिल के ,
करीब आने दिया,
दो अलग मज़हब,
दो अलग जाती ,
दो अलग भाषा ,
दो अलग भेष-भूषा,
दो विपरीत सोच,
दो अलग जिस्म,
दो अलग आत्मा,
मैं धरती तू आसँमा
दूर झितिज़ में मिलकर,
एक सोच,
एक आत्मा,
एक धड़कन,
एक धर्म(प्रेम),
बन गए,
बिना परवाह किये ,
"उनकी" जिनको कहती है,
दुनिया सारी प्रेम की भक्खछक,
दो जिस्म एक जान बनने से,
पहले ही छोड़ दिया दामन मेरा,
सारे वादे-कस्मे,
तोड़ कर,
माँ बाप के इंकार,
से ठुकरा रहा मुझे,
अपना कहने से,
अपना बनाने से,
फिर क्यों किया प्यार,
क्यों देखे सपने और दिखाए ,
बिन पूछे अपने माँ- बाप से....
"Azad Sikander"
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