प्रिय,
ये जो चुडि़याँ
तुम्हारी कल्लाइयों ,
कि शोभा बढ़ा रही है,
ये उन नन्हें कल्लाइयों
कि हुनर है,
जिनके हाथो से छिन गया ,
कलम पकड़ने का अधिकार,
जो तुम्हारी कलियों कि
शोभा बढाते हुए भी
कम कर रही है.
क्यों प्रिय,
नहीं चाहती तुम,
दाग न लगे इनकी शोभा पर,
चाहती हो न
तो फिर फेक दो इसे
जब तक बढ न जाये
“उनके” हाथो कि शोभा।
"Azad Sikander"
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