Thursday, October 25, 2007

सपने सपने रह जायेंगे

जीना चाहता हुँ ,
मौत करीब है,
दुःख है असमय जा रहा हुँ,
कुछ करना चाहता था,
कर न पाया,
जिम्मेदार मैं हुँ,
अब तक दोस दूसरो को देता आया.

चाँक्लेट समझ कर ,
पान- गुटखा खाया,
सरबत समझ कर शराब पिया,
पहली बार चखा था, मजाक में
जाने कब इसका आदि हो गया,

छोडा भी इसे तब जब देर देर हो चुकी,
यह खराबी है समझ में आया,
तब जब लाइलाज बीमारी अपने आगोश ,
में ले चुकी

वे सपने सपने रह जायेंगे,
जो अपने और अपने लोगो के लिए देखा था,
कितना हानी किया ,
अपना और अपने लोगो का

उम्मिद है मेरा हाल देख कर ,
संभल जायेगे वो
जो नहीं जानते कितना ,
गलत हैं वो…

"Azad Sikander"

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