Sikander Kushwaha
Sunday, November 4, 2007
मेरी कलम चलते-चलते ...........
मेरी कलम चलते-चलते
रुक सी जाती हैं
लेखनी के भाव- लय
बिच में ही भंग हो जाती हैं
मुझमे हिमालय सा
द्रिद्ता तो हैं पर
सागर सा गहराई नहीं
उत्साह तो हैं मगर
वह भी अधूरा
शायद इसलिय की
मैं खुद हुं अधुरा तुम बिन…………
"Azad Sikander"
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